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चमत्कारी महाप्रभावी प्रतिमा -

वि. सं. १७८६ की बात है श्री संघ श्रेष्ठीवर्य श्री केशवजी नायक, कच्छ कोठरावालो ने श्री आदिश्वर भगवान की एक प्रतिमा भरवाई जिसकी अंजनशलाका सिद्धक्षेत्र पालीताणा में प. पू. आचार्य श्री पादलीप्तसुरीश्वरजी के शिष्य आचार्य श्री रत्नसागरसुरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में माघ शुक्ला सप्तमी को हुई थी कुछ समय पश्चात किसी गाव के श्रावक इस प्रतिमाजी को महाराष्ट्र के अपने गांव में बिराजमान करने हेतु लेकर जा रहे थे, प्रवास करते - करते वो ठाणे नगर में पहुंचे रात्रि का समय देख कर यही विश्राम हेतु रुके, दूसरे दिन वो श्रावक बन्धु इस प्रतिमा जी को उठाने लगे किन्तु प्रतिमाजी टस से मस नहीं हुई। कई तरह के प्रयास किये गए पर सब निष्फल। अतः चमत्कारी रुप से आई हुई श्री आदेश्वरदादा की प्रतिमा को यहाँ के श्रावकों द्वारा कई वर्षों तक मेहमान रुप में रखने के बाद श्री जैन संघ ने घर मंदिर बनवाकर वीर निर्वाण सं. २४१२, विक्रम सं. १९४३ की वैशाख शुक्ला ६ को गादी पर बिराजमान किया।

कोंकण शत्रुंजय की परिकल्पना के शिल्पी -

वि. सं. १९८७ में न्यायाम्भोनिधि, सरस्वती उपासक पूज्य आचार्य श्री विजयानंदसूरीश्वरजी (प्रसिद्ध नाम आत्मारामजी ) महाराज के शिष्य जैन सिद्धान्तों के मर्मज्ञ तार्किक मुनि श्री शान्तिविजयजी का यहाँ पदार्पण हुआ उन्होंने अपने स्वरोदय तथा प्रश्नतंत्र के आधार पर यह जाना की श्री आदेश्वर जी मंदिर के सामने खाली पड़े भूखण्ड पर यदि तीर्थंकर परमात्मा श्री मुनिसुव्रत स्वामीजी का जिनालय बन जाये तो ठाणे श्री संघ के लिए श्रेयस्कर होगा - अतः उनकी हार्दिक प्रेरणा से उक्त भूमि को खरीद कर मुनिश्री की भावना अनुरुप उन्ही के सफल सानिध्य में नूतन जिनालय का भूमिपूजन व खनन मुहूर्त किया गया किन्तु मुहूर्त के समय कोई साधन सामग्री भूल जाने से मुनिश्री को आत्मज्ञान हुआ की इस जिनालय का निर्माण कार्य १२ वर्ष तक रुका रहेगा, अतः वैसा ही हुआ श्री संघ ने कई प्रयास किये, फिर भी सफलता हाथ न लगी। ठीक १२ वर्ष पश्चात शुद्ध चारित्रपालक खत्तरगच्छीय आचार्य श्री ऋद्धिसूरीश्वरजी म. सा. का ठाणे नगर में शुभागमन हुआ और उनके अथक प्रयासों व कुशल मार्गदर्शन में इस जिनालय का रुका हुआ निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ जो लगातार चलते, शीघ्र पूरा हुआ।

जीवन्त तीर्थ -

श्री संघ के परम सौभाग्य से वि. सं २००५ महा सुदी ५ यानि बसंत पंचमी के पावन दिन परमपूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद विजय प्रतापसूरीश्वरजी म. सा. व खत्तरगच्छिय आचार्य श्रीमद विजय ऋद्धिसूरीक्ष्वरजी म. सा. के सानिध्य मे प्रभुजी कीं प्राण प्रातिष्ठा महोत्सव सानंद संपन्न हुई । मुनिश्री शांति विजयजी के कथनानुसार ही २० वे तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रत स्वामी को मूलनायक के रूपमे बिराजमान किया गया जिनकी अंजनविधि वि. सं. २००४ मे शासन सम्राट पूज्य आचार्य श्री नेमिसुरिश्वरजी म. सा. की पावन मिश्रा मे गुजरात राज्य के वढवांण शहर मे हुई थी। अंजनविधी करते समय आचार्य श्री को लगा था की यह प्रतिमा जहाँ काहीं भी बिराजमान होगी वो स्थल तीर्थ रूप मे प्रसिद्धी प्राप्त करेगा । फलस्वरुप कदम दर कदम प्रगति पथ पर गतिशील व अनेक उपलब्धियो को आत्मसात करता हुआ यह स्थान अपने आप मे एक जिवन्त तीर्थ बन चुका है प्रतिष्ठा के अवसर पर भी धरणेन्द्र देवता के लगभग ६ घंटे तक प्रत्यक्ष दर्शन दे कर सभी को मनोमुग्ध कर दिया था इस के साथ ही मूलनायक मुनिसुव्रतस्वामीजी की प्रतिमा से अमी झरना हुआ था ।

विशिष्टता -

इस मन्दिर के मध्य भाग मे नवपदमय श्री सिद्धचक्र महायंत्र की स्थापना की गयी है संगमरमर पत्थर पर बारीक कोरणी कर शिल्पीयो ने आगाध परिश्रम द्वारा इस यंत्र को मूर्त रूप दिया है इस प्रकार यंत्र ( मंत्रवाला व्यवस्थित स्मारक ) भारत भर मे कही भी दृष्टी गोचर नहीं होता है इस के तलमजले की दिवारे अनेक ऐतिहासिक प्रसंगो के साक्षात दर्शन करनेवाले पटो से विनिर्मित व पहिली मंजिल के उपर तीन उतुंग शिखरों से सुशोभित यह जिन प्रासाद पिछले ६६ वर्षो से आत्मार्थियों की पावन पुनित धर्म आस्था का केन्द्र रहा है इस प्रकार सतत दर्शनार्थियों से छलकता यह जिनालय अपने आप मै अनूठी भव्यता को समेटे हुए है ।

प्राचीनता -

तीर्थंकर परमात्मा श्री मुनिसुव्रतस्वामी के शासनकाल में ही संयम और तप की प्रभावना करनेवाले श्रीपालराजा और मैनासुन्दरी का जन्म हुआ था। उसी मध्यकाल में राम, लक्ष्मण, हनुमान जैसे महापुरुषो तथा सीता जैसी महासती का अविर्भाव हुआ था। ठाणे नगर के राजा वसुपाल की पुत्री मदन मंजरी का लग्न श्रीपालराजा के साथ होने से वे यहाँ के जमाईराज थे दुसरी तरफ वसुपाल राजा की बहन कमलप्रभा कर पुत्र होने के कारण वे यहाँ भाणेज थे और इस थाने नगर के समुद्र में श्रीपाल राजा को मारने का धवल सेठ ने दुःसाहस किया था। श्रीपालराजा व मैनासुन्दरी दोनों ने यही पर श्री सिद्धचक्र की सम्यग आराधना कर अतुल रिद्धी-सिद्धी प्राप्त की थी। इस प्रकार श्रीपाल राजा ठाणे नगर का सम्बन्ध सर्व विदित है तथा पंजाब केसरी प. पू. आ. देव श्रीमद विजय वल्लभसुरीश्वरजी म. सा. की पावन निश्रा में सं. २००९ में ठाणा नगर में ५२५ भाई-बहनों द्वारा ऐतिहासिक उपधान तप आराधना संपन्न हुई थी।

शाश्वत मूल्यों का प्रतीक -

नव निर्मित आदिनाथ जिनालय - समय के साथ साथ श्री आदेश्वरजी का यह गृह मन्दिर जीर्ण होने लगा अतः श्री राजस्थान जैन संघ ठाणे ने अपनी विरल सांस्कृतिक परम्पराओं को जीवन्त रखने के लिए उसी जगह पर आधुनिक शिल्प कला के अनुरूप त्रण शिखरी विशाल जिनालय का निर्माण कराने का निश्चय किया फलस्वरुप शासन सम्राट आचार्य श्री नेमिसुरिश्वरजी म. सा. समुदाय के आचार्य प्रवर श्री विशालसेनसुरीश्वरजी म. सा. के कुशल मार्गदर्शन व सफल सान्निध्य में वि. सं. २०३८, वैशाख सुदी १० को भूमिपूजन व वि. सं. २०३८, जेठ सूद ५ को शिलान्यास विधि के साथ इस संस्थान के विकास की यशोगाथा का श्रीगणेश हुआ। इस नयनरम्य मंदिरजी की प्रतिष्ठा पंजाब केशरी युगदृष्टा आचार्य भगवंत श्री विजय वल्लभसुरिश्वरजी म. सा. समुदाय के धीर गंभीर आचार्य श्री रत्नाकरसुरीश्वरजी म. सा. के सुहस्ते वीर निर्वाण सं. २५२० तदनुसार विक्रम सं. २०५०, महासुद १०, दिनांक २१ फरवरी १९९४, सोमवार को संपन्न हुई है। नक्शीदार खम्भों, छत्तों, छज्जों, आलों, पावट व गुंबजों पर की गई पाषाण कला आकर्षक व चित्त लुभावनी लगती है जो शिल्पकारों की श्रद्धा व साधना का परिचय देती है। वास्तव में यह जिन चैत्यालय ठाणे नगर का - कला व सौन्दर्य युक्त खजाना है। इस प्रकार जिनशासन की प्रतिनिधि संस्थाओं मे एक और यशस्वी नाम जुड़ गया है ठाणे तीर्थ का।